कहानी छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद की,कहानी वीर नारायण सिंह की।
खुशनसीब हैं वो जो वतन पर मिट जाते हैं,
मरकर भी वो लोग अमर हो जाते हैं,
करता हूँ उन्हें सलाम ए वतन पे मिटने वालों,
तुम्हारी हर साँस में तिरंगे का नसीब बसता है।
छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद वीर नारायण सिंह का जन्म सन् 1795 में सोनाखान के जमींदार रामसाय के हर हुआ था। वे बिंझवार आदिवासी समुदाय के थे। वे अपने पिता की तरह ही वीर साहसी तथा देशभक्त थे। पिता की मृत्यु के पश्चात 1830 में वे सोनाखान के जमींदार बने।
वीर नारायण सिंह स्वभाव से परोपकारी, न्यायप्रिय तथा कर्मठ वीर नारायण जल्द ही लोगों के प्रिय जननायक बन गए। लोग उन्हें गोंडवाना का शेर कहते थे।
1856 में छत्तीसगढ़ भयंकर अकाल की चपेट में आ गया।, अकाल और अंग्रेजो की नीतियों के कारण प्रांत वासी भुखमरी का शिकार हो रहे थे। कसडोल के व्यापारी माखन का गोदाम अन्न से भरा था। वीर नारायण ने उससे अनाज गरीबों में बांटने का आग्रह किया लेकिन वह तैयार नहीं हुआ। इसके बाद प्रजाहितैषी वीर नारायण सिंह ने माखन के गोदाम से अनाज निकाल दाने दाने के लिए तरस रहे ग्रामीणों में बंटवा दिया। व्यापारी माखन ने इसकी शिकायत अंग्रेजो से कर दी उनके इस कदम से नाराज ब्रिटिश शासन ने उन्हें 24 अक्टूबर 1856 में संबलपुर से गिरफ्तार कर रायपुर जेल में बंद कर दिया।
1857 में जब स्वतंत्रता की लड़ाई तेज हुई तो प्रांत के लोगों ने जेल में बंद वीर नारायण को ही अपना नेता मान लिया और समर में शामिल हो गए। उन्होंने अंग्रेजों के बढ़ते अत्याचारों के खिलाफ बगावत करने की ठान ली थी। नाना साहब द्वारा उसकी सूचना रोटी और कमल के माध्यम से देश भर की सैनिक छावनियों में भेजी जा रही थी। यह सूचना जब रायपुर पहुँची, तो सैनिकों ने कुछ देशभक्त जेलकर्मियों के सहयोग से कारागार से बाहर तक एक गुप्त सुरंग बनायी और नारायण सिंह को मुक्त करा लिया।
जेल से मुक्त होकर वीर नारायण सिंह ने 500 सैनिकों की एक सेना गठित की और 20 अगस्त, 1857 को सोनाखान में स्वतन्त्रता का बिगुल बजा दिया। इलियट ने स्मिथ नामक सेनापति के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना भेज दी। पर नारायण सिंह ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली थीं। उन्होंने सोनाखान से अचानक बाहर निकल कर ऐसा धावा बोला कि अंग्रेजी सेना को भागते भी नहीं बना; पर दुर्भाग्यवश सोनाखान के आसपास के अनेक जमींदार अंग्रेजों से मिल गये। इस कारण नारायण सिंह को पीछे हटकर एक पहाड़ी की शरण में जाना पड़ा। अंग्रेजों ने सोनाखान में घुसकर पूरे नगर को आग लगा दी।
नारायण सिंह में जब तक शक्ति और सामर्थ्य रही, वे छापामार प्रणाली से अंग्रेजों को परेशान करते रहे। काफी समय तक यह गुरिल्ला युद्ध चलता रहा; पर आसपास के जमींदारों की गद्दारी से नारायण सिंह फिर पकड़े गये और उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। कैसा आश्चर्य कि जनता ने जिसे राजा के रूप में अपने हृदय मन्दिर में बसाया, उस पर राजद्रोह का मुकदमा ? पर अंग्रेजी शासन में न्याय का नाटक ऐसे ही होता था।
मुकदमे में वीर नारायण सिंह को मृत्युदंड दिया गया। 10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जयस्तंभ चौक पर स्वतंत्रता के इस अमर सेनानी को फाँसी दे दी गयी,अंग्रेजो की बर्बरता यही नही रुकी फाँसी के उपरांत उनके मृत शरीर को तोप से उड़ा दिया गया। रायपुर का‘जय स्तम्भ’ चौक आज भी छत्तीसगढ़ के उस वीर सपूत की याद दिलाता है।प्रदेश का आदि जाती कल्याण विभाग इस महान सपूत की याद में पुरुस्कार प्रदान करता है। उनकी स्मृति में में रायपुर अंतरास्ट्रीय स्टेडियम का नाम शहीद वीर नारायण सिंह अंतरास्ट्रीय स्टेडियम रखा गया है।
मरकर भी वो लोग अमर हो जाते हैं,
करता हूँ उन्हें सलाम ए वतन पे मिटने वालों,
तुम्हारी हर साँस में तिरंगे का नसीब बसता है।
छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद वीर नारायण सिंह का जन्म सन् 1795 में सोनाखान के जमींदार रामसाय के हर हुआ था। वे बिंझवार आदिवासी समुदाय के थे। वे अपने पिता की तरह ही वीर साहसी तथा देशभक्त थे। पिता की मृत्यु के पश्चात 1830 में वे सोनाखान के जमींदार बने।
वीर नारायण सिंह स्वभाव से परोपकारी, न्यायप्रिय तथा कर्मठ वीर नारायण जल्द ही लोगों के प्रिय जननायक बन गए। लोग उन्हें गोंडवाना का शेर कहते थे।
1856 में छत्तीसगढ़ भयंकर अकाल की चपेट में आ गया।, अकाल और अंग्रेजो की नीतियों के कारण प्रांत वासी भुखमरी का शिकार हो रहे थे। कसडोल के व्यापारी माखन का गोदाम अन्न से भरा था। वीर नारायण ने उससे अनाज गरीबों में बांटने का आग्रह किया लेकिन वह तैयार नहीं हुआ। इसके बाद प्रजाहितैषी वीर नारायण सिंह ने माखन के गोदाम से अनाज निकाल दाने दाने के लिए तरस रहे ग्रामीणों में बंटवा दिया। व्यापारी माखन ने इसकी शिकायत अंग्रेजो से कर दी उनके इस कदम से नाराज ब्रिटिश शासन ने उन्हें 24 अक्टूबर 1856 में संबलपुर से गिरफ्तार कर रायपुर जेल में बंद कर दिया।
1857 में जब स्वतंत्रता की लड़ाई तेज हुई तो प्रांत के लोगों ने जेल में बंद वीर नारायण को ही अपना नेता मान लिया और समर में शामिल हो गए। उन्होंने अंग्रेजों के बढ़ते अत्याचारों के खिलाफ बगावत करने की ठान ली थी। नाना साहब द्वारा उसकी सूचना रोटी और कमल के माध्यम से देश भर की सैनिक छावनियों में भेजी जा रही थी। यह सूचना जब रायपुर पहुँची, तो सैनिकों ने कुछ देशभक्त जेलकर्मियों के सहयोग से कारागार से बाहर तक एक गुप्त सुरंग बनायी और नारायण सिंह को मुक्त करा लिया।
जेल से मुक्त होकर वीर नारायण सिंह ने 500 सैनिकों की एक सेना गठित की और 20 अगस्त, 1857 को सोनाखान में स्वतन्त्रता का बिगुल बजा दिया। इलियट ने स्मिथ नामक सेनापति के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना भेज दी। पर नारायण सिंह ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली थीं। उन्होंने सोनाखान से अचानक बाहर निकल कर ऐसा धावा बोला कि अंग्रेजी सेना को भागते भी नहीं बना; पर दुर्भाग्यवश सोनाखान के आसपास के अनेक जमींदार अंग्रेजों से मिल गये। इस कारण नारायण सिंह को पीछे हटकर एक पहाड़ी की शरण में जाना पड़ा। अंग्रेजों ने सोनाखान में घुसकर पूरे नगर को आग लगा दी।
नारायण सिंह में जब तक शक्ति और सामर्थ्य रही, वे छापामार प्रणाली से अंग्रेजों को परेशान करते रहे। काफी समय तक यह गुरिल्ला युद्ध चलता रहा; पर आसपास के जमींदारों की गद्दारी से नारायण सिंह फिर पकड़े गये और उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। कैसा आश्चर्य कि जनता ने जिसे राजा के रूप में अपने हृदय मन्दिर में बसाया, उस पर राजद्रोह का मुकदमा ? पर अंग्रेजी शासन में न्याय का नाटक ऐसे ही होता था।
मुकदमे में वीर नारायण सिंह को मृत्युदंड दिया गया। 10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जयस्तंभ चौक पर स्वतंत्रता के इस अमर सेनानी को फाँसी दे दी गयी,अंग्रेजो की बर्बरता यही नही रुकी फाँसी के उपरांत उनके मृत शरीर को तोप से उड़ा दिया गया। रायपुर का‘जय स्तम्भ’ चौक आज भी छत्तीसगढ़ के उस वीर सपूत की याद दिलाता है।प्रदेश का आदि जाती कल्याण विभाग इस महान सपूत की याद में पुरुस्कार प्रदान करता है। उनकी स्मृति में में रायपुर अंतरास्ट्रीय स्टेडियम का नाम शहीद वीर नारायण सिंह अंतरास्ट्रीय स्टेडियम रखा गया है।

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